नवरात्रि की बात हो और गरबा का नाम न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। गुजरात से शुरू हुआ यह लोकनृत्य आज पूरे भारत और दुनिया भर में बसे गुजराती परिवारों की पहचान बन चुका है।
गरबा का अर्थ
गरबा शब्द संस्कृत के गर्भ और दीप से जुड़ा माना जाता है। पारंपरिक गरबा में बीच में छेद वाला मिट्टी का घड़ा रखा जाता है, जिसके अंदर दीपक जलता है। यह घड़ा शरीर का और दीपक उसके अंदर की दिव्य शक्ति का प्रतीक है। लोग इसी घड़े या माँ अंबा की तस्वीर के चारों ओर गोल घेरे में नाचते हैं। गोल घेरा जीवन के चक्र को दर्शाता है, जिसमें सब कुछ घूमकर फिर वहीं लौट आता है।
गरबा और डांडिया में अंतर
गरबा में हाथों की तालियाँ और शरीर की लय होती है, और यह आम तौर पर आरती से पहले देवी के सम्मान में खेला जाता है। डांडिया रास में लोग रंगीन लकड़ी की छोटी डंडियाँ लेकर जोड़ी में नाचते हैं। डांडिया को माँ दुर्गा और महिषासुर के बीच हुए युद्ध का प्रतीक भी माना जाता है, जहाँ डंडियाँ देवी की तलवार जैसी हैं। कई जगह आरती के बाद डांडिया खेला जाता है।
कुछ लोकप्रिय स्टेप्स
दो ताली, तीन ताली और हीच जैसे स्टेप्स गरबा में सबसे ज़्यादा खेले जाते हैं। नए लोगों के लिए दो ताली सबसे आसान है, जिसमें दो कदम आगे बढ़कर दो बार ताली बजाई जाती है। धीरे-धीरे लय पकड़ में आ जाती है।
गरबा खेलने जाने से पहले
आरामदायक और सांस लेने वाले कपड़े पहनें। चनिया-चोली या केडियू के साथ ऐसे जूते या मोजड़ी चुनें जो पैर में फिसलें नहीं। खेलने के बीच पानी पीते रहें, क्योंकि कई घंटे लगातार नाचने से शरीर में पानी की कमी हो सकती है। अगर व्रत रखा है तो खेलने से पहले फल, दूध या मखाने जैसी हल्की चीज़ ज़रूर खाएँ। देर रात लौटते समय ग्रुप में रहें और अपने घर वालों को बताकर रखें कि आप कहाँ हैं।