माँ की कथा
शैल का अर्थ है पर्वत। पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लेने के कारण माँ का नाम शैलपुत्री पड़ा। पिछले जन्म में वे राजा दक्ष की पुत्री सती थीं, जिन्होंने पिता के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान होने पर स्वयं को अग्नि को सौंप दिया था। अगले जन्म में वे पार्वती बनकर फिर से शिव की अर्धांगिनी बनीं। माँ नंदी बैल पर सवार हैं, उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में कमल है। उनकी पूजा मन को स्थिर करती है, जैसे पर्वत अपनी जगह अडिग रहता है।
पूजा कैसे करें
सुबह स्नान करके शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना करें। मिट्टी के पात्र में जौ बोएँ, कलश पर आम के पत्ते और नारियल रखें। माँ को लाल या नारंगी फूल चढ़ाएँ, घी का दीपक जलाएँ और मंत्र का 108 बार जाप करें। अंत में आरती करके घी का भोग लगाएँ।
मंत्र
ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः
शुभकामना संदेश
माँ शैलपुत्री का आशीर्वाद आपके घर में सुख और शांति लेकर आए। नवरात्रि के पहले दिन की हार्दिक शुभकामनाएँ!
जैसे पर्वत अडिग रहता है, वैसे ही आपका विश्वास हर मुश्किल में मज़बूत रहे। जय माँ शैलपुत्री!
कलश की स्थापना के साथ आपके जीवन में नई खुशियों की शुरुआत हो। शुभ नवरात्रि!